शनिवार, 30 जुलाई 2016

एक भी गुण सारे दोषों को दूर कर देता है

!!!---: एक भी गुण सारे दोषों को दूर कर देता है :---!!!
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"त्र्यालाश्रयाSपि विफलापि सकण्टकाSपि ।
वक्राSपि पंकिलभवाSपि दुरासदाSपि ।
गन्धेन बन्धुरसि केतकि सर्वजन्तोः
एको गुणः खलु निहन्ति समस्तदोषान् ।।
(चाणक्य-नीति--17.20)



अर्थः---हे केतकि ! यद्यपि तू साँपों का घर है, फल से रहित है, काँटों से युक्त है, टेढी भी है, उत्पन्न भी कीचड में होती है, प्राप्त भी कठिनता से होती है---इतना सब कुछ होने पर भी तू केवल अपने "गन्ध" गुण के कारण सब प्राणियों के मन को मोह रही है । इससे निश्चय होता है कि एक भी गुण सारे दोषों को दूर कर देता है ।
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शनिवार, 9 जुलाई 2016

मनुष्य की परीक्षा

!!!--: मनुष्य की परीक्षा :---!!!
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"यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः ।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा ।।"
(चाणक्य-नीतिः--5.2)

अर्थः---जैसे सोने के खरे और खोटेपन को जानने के लिए उसकी घिसने, काटने, तपाने और कूटने से परीक्षा की जाती है, वैसे ही मनुष्य की परीक्षा भी दान, शील, गुण और आचरण से होती है ।

विमर्शः---मनुष्य किसे कहते हैं ? आचार्य चाणक्य के अनुसार मनुष्य वह है जो दानी है, शील से सम्पन्न है, सभी शुभ गुणों से सुभूषित है तथा जिसके आचरण श्रेष्ठ है ।

महर्षि दयानन्द ने "मनुष्य" की परिभाषा इस प्रकार से की हैः---

"मनुष्य उसी को कहना कि जो मननशील होकर स्वात्मवत् अन्यों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझें, अन्यायकारी-बलवान् से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे । इतना ही नहीं, किन्तु अपने सर्वसामर्थ्य से धर्मात्माओँ की चाहे वे वे महा अनाथ, निर्बल और गुणरहित क्यों न हों, उनकी रक्षा, उन्नति, प्रियाचरण और अधर्मी चाहे चक्रवर्ती, सनाथ, महाबलवान् और गुणवान् भी हों तथापि उनका नाश, अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करे अर्थात् जहाँ तक हो सके, वहाँ तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा किया करे । इस काम में चाहे उसको कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भी भले ही जाएँ, परन्तु इस मनुष्यपन रूप धर्म से पृथक् कभी न होवें ।
(स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश)

सब दानों में प्राणदान सबसे बढकर है, जो धर्म, सत्य और न्याय की वेदी पर अपने प्राणों का बलिदान कर सके वही सच्चा मनुष्य है ।

"शीलं परं भूषणम्---शील मनुष्य का सबसे बडा आभूषण है । शील से रहित मनुष्य तो पशु ही है । आचार्य भर्तृहरि जी लिखते हैंः--

"येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ।।"
(नीतिशतक--12)

जिन मनुष्यों में न विद्या है, न तप है, न दान देने की भावना है, न ज्ञान है, न शील है, न ही जीवन में कोई उत्तम गुण है और न धर्म है, वे पृथिवी पर भाररूप पशु ही है, जो मनुष्य के रूप में विचरा करते हैं ।

मनुष्य की परीक्षा कर्म से होती है । वेद ने कहाः--

"अकर्मा दस्युः ।" (ऋग्वेदः--10.22.8)

कर्म न करने वाला मनुष्य दस्यु (चोर, डाकु) है ।

इसका फलितार्थ यह हुआ कि "सुकर्मा आर्यः" शुभ कर्म करने वाला, आचरणवान् मनुष्य आर्य है, श्रेष्ठ मनुष्य है ।

"गुणैरुत्तुङ्गतां याति नोच्चैरासनसंस्थितः ।
प्रासादशिखरस्थोपि काकः किं गरुडायते ।।"



अर्थः---मनुष्य गुणों से ही उच्चता प्राप्त करता है, ऊँचे आसन पर बैठने से नहीं । क्या राजभवन के शिखर पर बैठने से कौआ हंस बन सकता है ? कदापि नहीं ।।
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गुरुवार, 7 जुलाई 2016

आचार्य चाणक्य की सादगी

!!!---: चाणक्य की सादगी :---!!!
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मौर्य सम्राट् चन्द्रगुप्त के प्रधानमन्त्री आचार्य चाणक्य की कुटिया पर एक दिन एक महात्मा पधारे । भोजन की बेला थी । आचार्य ने अतिथि से अनुरोध किया कि वह उनके साथ भोजन करे । महात्मा ने उनके अनुरोध को सहर्ष स्वीकार कर लिया ।

कुटिया के एक कक्ष में पाकशाला (रसोई) थी । वहाँ दो महिलाएँ भोजन बनाने में संलग्न थीं । उन्होंने शीघ्रता से भोजन परोसा । भोजन बहुत ही सादा था ---थोडे-से चावल, कढी और एक सब्जी । साधु को बहुत आश्चर्य हुआ । वह बोल उठे---"आप इस बडे साम्राज्य के निर्माता और शक्तिशाली प्रधानमन्त्री हैं , फिर यह सादा जीवन क्यों बिताते हैं ?"

आचार्य चाणक्य ने कहा---"जनता की सेवा के लिए मैं प्रधानमन्त्री बना हूँ । इसका अर्थ यह नहीं कि राज्य की सम्पत्ति का मैं उपयोग करूँ ।यह कुटिया भी मैंने अपने हाथों से बनाई है ।"

महात्मा पूछ उठे----"आप अपनी आजीविका के लिए भी कुछ करते हैं ?"

!! चाणक्य ने उत्तर दिया----"हाँ, मैं भाष्य और पुस्तकें लिखता हूँ । मैं प्रतिदिन राज्य के लिए आठ घण्टे और अपने और परिवार के लिए चार घण्टे काम करता हूँ । मेरी कोशिश है कि राज्य में कोई दुःखी न हो ।"

महात्मा ने कहा---"यहाँ तो कोई दुःखी नहीं, पर पास के गाँव में गाँव वाले एक चोर से बडे दुःखी हैं । चोर उनके कम्बल चुरा ले जाता है ।"

आचार्य चाणक्य ने उन दुःखी गाँव वालों के लिए राजभण्डार से कम्बल मँगवाए । अगले दिन कम्बल बँटने थे, इसलिए वे कम्बल रात में उनकी कुटिया में ही रख दिए गए ।

चोर ने उस रात्रि को आचार्य चाणक्य की कुटिया में ही चोरी की योजना बनाई । वह दबे पाँव आचार्य की कुटिया में घुस आया । उसने देखा कि प्रधानमन्त्री आचार्य चाणक्य स्वयं एक पुराना सिला कम्बल ओढे सो रहे हैं । उनके बगल में नए कम्बलों का ढेर लगा हुआ था ।

चोर प्रधानमन्त्री चाणक्य की स्वार्थ-हीनता देखकर पछतावे से भर गया और अपने कार्य पर दुःखी हुआ ।

अगले दिन जब गाँव वाले जागे तब उनके कम्बल दरवाजों के बाहर पडे थे । इतिहास गवाह है कि मौर्य साम्राज्य में इस घटना के बाद कोई चोर नहीं रह गया ।

श्रीमान् राजीव दीक्षित जी के अनुसार 1835 तक भारत में कोई चोर नहीं था । मुसलमान और अंग्रेजों के कारण इस देश में चोर और बलात्कारी हो गए ।

आज इस प्रकार की घटना होती तो उस महात्मा को सिद्ध करना पडता कि चोरी हुई या नहीं । यदि चोरी हुई तो किसने की । यदि चोर पकडा जाता तो वह बच भी सकता है, पैसे के बल पर और यदि सजा हो भी जाती तो वह चोर चोरी करना छोड देता ऐसा कहना असम्भव है । यहाँ तो सभी चोर हैं ।


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