रविवार, 15 मई 2016

विधिरहित यज्ञ शत्रु के समान है



!!!---: विधिरहित यज्ञ शत्रु के समान है :---!!!
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"अन्नहीनो दहेद् राष्ट्रं मन्त्रहीनश्च ऋत्विजः ।
यजमानं दानहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः ।।"
(चाणक्य-नीतिः---08.22)

अर्थः----अन्नहीन यज्ञ राष्ट्र को, मन्त्रहीन यज्ञ ऋत्विज् (पुरोहित) को और दानहीन यज्ञ यजमान को भस्म कर देता है । संसार में (विधिहीन) यज्ञ के समान कोई शत्रु नहीं है ।

विमर्शः---यज्ञ कामधेनु है, यज्ञ कल्पवृक्ष है, परन्तु विधि-विधान से न करने पर यज्ञ शत्रु बन जाता है ।

महाराज दशरथ ने भी कहा था---

"विधिहीनस्य यज्ञस्य कर्त्ता सद्य विनश्यति ।"
(वा. रा. बाल. 8.18)
विधिहीन यज्ञ करने वाला शीघ्र नष्ट हो जाता है ।

श्रीकृष्ण जी कहते हैं----

"विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं प्रचक्षते ।।"
(गीता---17.13)

अर्थः----जो शास्त्रविधि से रहित हो, जिसमें लोक-कल्याणार्थ अन्नदान न दिया गया हो, जिसमें वेदमन्त्रों का उच्चारण न किया गया हो, जिसमें यज्ञ करने वालों को दक्षिणा न दी गई हो और अश्रद्धा से किया गया हो, ऐसे यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं ।

ऐसे यज्ञ लाभकारी नहीं है । विधि-विधान से किए हुए यज्ञ इस लोक में मनुष्य को धन-धान्य से सम्पन्न बनाते हैं और अन्त में मोक्ष में पहुँचाते हैं ।
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शुक्रवार, 6 मई 2016

सबसे हल्का याचक

!!!---: सबसे हल्का याचक :---!!!
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"तृणं लघु तृणात्तूलं तूलादपि च याचकः ।
वायुना किं न नीतो असौ मामयं याचयिष्यति ।।"
(चाणक्य-नीतिः---16.15)
अर्थः----
संसार में तिनका अत्यन्त हल्का होता है, तिनके से भी रूई अधिक हल्की होती है और रूई से भी याचक (भिखारी) अधिक हल्का होता है ।
प्रश्न यह है कि यदि याचक रूई से भी अधिक हल्का होता है तो वायु उसे उडा कर क्यों नहीं ले जाता ?
उत्तर यह है कि यह याचक मुझसे भी कुछ माँग न ले, इस भय से वायु उसे उडा कर नहीं ले जाता ।
विमर्शः--- माँगना सबसे नीच कर्म माना गया है । हिन्दी में रहीम का एक दोहा देखिएः---

"रहिमन वे नर मर चुके जो कहुँ माँगन जाहि ।
उनते पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाहि ।।"

कबीरदास ने भी कहा हैः---

"आब गयी आदर गया नैनन गया सनेहु ।
वे तीनों तब ही गए जब ही कहा कछु देहु ।।"
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रविवार, 1 मई 2016

ऐसे लोगों से मित्रता न करें

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"दुराचारी च दुर्दृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः ।
यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्रं विनश्यति ।।"
(चाणक्य-नीतिः---02.19)

अर्थः----मनुष्य को चाहिए कि दुराचारी, कुदृष्टि वाले, बुरे स्थान में रहने वाले और दुर्जन मनुष्य के साथ मित्रता न करें, क्योंकि इनके साथ मित्रता करने वाला मनुष्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ।


विमर्श----

दुर्जन व्यक्ति से दूर रहने में ही लाभ हैः---

"दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययालंकृतोपि सन् ।
मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकरः ।।"
(चाणक्यशतक---3.35)

अर्थः---विद्या के अलंकार से अलंकृत होने पर भी दुर्जन से दूर ही रहना चाहिए, क्योंकि मणि से भूषित होने पर भी क्या सर्प भयंकर नहीं होता ।

"दुर्जनः प्रियवादी च नैव विश्वासकारणम् ।
मधु तिष्ठति जिह्वाग्रे हृदि हलाहलं विषम् ।।"
(चाणक्य-शतक---3.28)



अर्थः----दुर्जन और चापलूस (खुशामदी) पर विश्वास कभी न करें , क्योंकि इनकी जिह्वा के अग्रभाग पर तो मधु होता है, परन्तु हृदय में हलाहल विष भरा होता है ।
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