शुक्रवार, 6 मई 2016

सबसे हल्का याचक

!!!---: सबसे हल्का याचक :---!!!
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"तृणं लघु तृणात्तूलं तूलादपि च याचकः ।
वायुना किं न नीतो असौ मामयं याचयिष्यति ।।"
(चाणक्य-नीतिः---16.15)
अर्थः----
संसार में तिनका अत्यन्त हल्का होता है, तिनके से भी रूई अधिक हल्की होती है और रूई से भी याचक (भिखारी) अधिक हल्का होता है ।
प्रश्न यह है कि यदि याचक रूई से भी अधिक हल्का होता है तो वायु उसे उडा कर क्यों नहीं ले जाता ?
उत्तर यह है कि यह याचक मुझसे भी कुछ माँग न ले, इस भय से वायु उसे उडा कर नहीं ले जाता ।
विमर्शः--- माँगना सबसे नीच कर्म माना गया है । हिन्दी में रहीम का एक दोहा देखिएः---

"रहिमन वे नर मर चुके जो कहुँ माँगन जाहि ।
उनते पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाहि ।।"

कबीरदास ने भी कहा हैः---

"आब गयी आदर गया नैनन गया सनेहु ।
वे तीनों तब ही गए जब ही कहा कछु देहु ।।"
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रविवार, 1 मई 2016

ऐसे लोगों से मित्रता न करें

!!!---: ऐसे लोगों से मित्रता न करें :---!!!
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"दुराचारी च दुर्दृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः ।
यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्रं विनश्यति ।।"
(चाणक्य-नीतिः---02.19)

अर्थः----मनुष्य को चाहिए कि दुराचारी, कुदृष्टि वाले, बुरे स्थान में रहने वाले और दुर्जन मनुष्य के साथ मित्रता न करें, क्योंकि इनके साथ मित्रता करने वाला मनुष्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ।


विमर्श----

दुर्जन व्यक्ति से दूर रहने में ही लाभ हैः---

"दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययालंकृतोपि सन् ।
मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकरः ।।"
(चाणक्यशतक---3.35)

अर्थः---विद्या के अलंकार से अलंकृत होने पर भी दुर्जन से दूर ही रहना चाहिए, क्योंकि मणि से भूषित होने पर भी क्या सर्प भयंकर नहीं होता ।

"दुर्जनः प्रियवादी च नैव विश्वासकारणम् ।
मधु तिष्ठति जिह्वाग्रे हृदि हलाहलं विषम् ।।"
(चाणक्य-शतक---3.28)



अर्थः----दुर्जन और चापलूस (खुशामदी) पर विश्वास कभी न करें , क्योंकि इनकी जिह्वा के अग्रभाग पर तो मधु होता है, परन्तु हृदय में हलाहल विष भरा होता है ।
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गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

महान् तप का फल

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"भोज्यं भोजनादिशक्तिश्च रतिशक्तिर्वराङ्ना ।
विभवो दानशक्तिश्च नाल्पश्च तपसः फलम् ।।"
(चाणक्य-नीतिः--2.2)

अर्थः----भोजन के योग्य पदार्थ और भोजन की शक्ति, सुन्दरी स्त्री और उसे भोगने की कामशक्ति, विपुल धनराशि तथा उसके साथ दान देने की भावना----ऐसे संयोगों का होना थोडे तप का फल नहीं है, अर्थात् महान् तप के फलस्वरूप ही ऐसे संयोग होते हैं ।

विमर्शः---

उपर्युक्त प्रकार के सम-संयोगों का निर्माण विधाता करता ही नहीं है, वह प्रायः विषम संयोग ही बनाता है, इसीलिए भोजन और भोजन-शक्ति तथा पति-पत्नी के सम्बन्ध में सर्वत्र निम्न स्थिति दिखाई देती हैः---


"जब चने थे तब दाँत न थे ।
जब दाँत भये तो चने नहीं ।।"

"यः सुन्दरस्तद् वनिता कुरूपा या सुन्दरी सा परिरूपहीना ।
यत्रोभयं तत्र दरिद्रता च विधेर्विचित्राणि विचेष्टितानि ।।"

अर्थः---जहाँ पुरुष सुन्दर है, वहाँ उसकी स्त्री कुरूप है । जहाँ पत्नी सुन्दरी है, वहाँ उसका पति रूपरहित है । जहाँ दोनों बातें हैं , वहाँ दरिद्रता (गरीबी) का साम्राज्य है । विधाता की लीलाएँ बडी विचित्र है ।

इसी प्रकार जिसके पास धन है, वह महाकंजूस है और जो उदार या दानी है उसके पास धन नहीं हैं ।

जब कभी भोजन और भोजन-शक्ति आदि तुल्य गुणों का संयोग होता है तब वह व्यक्ति के अपने पूर्वजन्म अथवा इस जन्म के महान् तप का फल होता है ।



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