सोमवार, 4 जुलाई 2016

संसार तृण के समान

!!!---: संसार तृण के समान :---!!!
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"तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गस्तृणं शूरस्य जीवितम् ।
जिताक्षरस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत् ।।"
(चाणक्य-नीति---5.14)

अर्थः---ब्रह्मज्ञानी के लिए स्वर्ग, शूरवीर के लिए जीवन, जितेन्द्रिय (जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया हो) के लिए स्त्री और निर्लोभी के लिए संसार तिनके के समान है ।

वस्तुतः शूरवीर तो एक क्षण में अपने जीवन का बलिदान कर देता है । सच्चे शूरवीर की तो ऐसी भावना होती है---

"बारह बरस लों कूकर जिये सोलह बरस लों स्यार ।


बरस अठारह छत्री जिये आगे जीने को धिक्कार ।।"

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शनिवार, 2 जुलाई 2016

ब्राह्मण रूपी नौका

!!!---: ब्राह्मण रूपी नौका :---!!!
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"धन्या द्विजमयी नौका विपरीता भवार्णवे ।
तरन्त्यधोगताः सर्वे उपरिस्थाः पतन्त्यधः ।।"
(चाणक्य-नीतिः--15.13)

अर्थः----ब्राह्मण रूपी नौका धन्य है । संसार रूपी सागर में यह उल्टी गति से चलती है । उल्टी गति क्या है , जो इस नाव के नीचे रहते हैं, वे सब तो तर जाते हैं, भवसागर से पार उतर जाते हैं और जो इस नाव में ऊपर चढते हैं, उनका पतन हो जाता है, वे नीचे गिर जाते हैं । तात्पर्य यह है कि जो ब्राह्मणों के साथ नम्रता का व्यवहार करते हैं, वे तर जाते हैं और जो नम्र नहीं रहते, अभिमान में चूर रह कर उनका अपमान करते हैं, उनका पतन हो जाता है ।

विमर्शः----धर्मात्मा और नीतिज्ञ महात्मा विदुर ने धृतराष्ट्र को विनाश की सूचना देने वाले आठ लक्षणों का निर्देश किया था----

विनाश को प्राप्त होने वाले पुरुष में निम्न आठ चिह्न पहले ही आ जाते हैंः---

(1.) वह ब्राह्मणों से द्वेष करने लगता है,
(2.) ब्राह्मणों से विरोध करता है,
(3.) ब्राह्मणों के धन को छीनता है,
(4.) ब्राह्मणों को मारने (शारीरिक दण्ड या नष्ट करने) की करता है,
(5.) ब्राह्मणों की निन्दा करने में सुख मानता है,
(6.) ब्राह्मणों की प्रशंसा से प्रसन्न नहीं होता,
(7.) उचित अवसरों (उत्सवादि) पर ब्राह्मणों का स्मरण नहीं करता (उनसे सम्मति नहीं लेता और उन्हें निमन्त्रित करता है)
(8.) ब्राह्मण यदि कुछ माँगते हैं तो उन्हें हीनता से देखता है ।

बुद्धिमान् मनुष्य को इन दोषों को जानना चाहिए और जानकर इन्हें त्याग देना चाहिए, अन्यथा विनाश निश्चित है ।


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बुधवार, 29 जून 2016

ब्राह्मण रूपी वृक्ष

!!!---: ब्राह्मण रूपी वृक्ष :---!!!
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"विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् ।
तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ।।"
(चाणक्य-नीतिः--10.13)

अर्थः---ब्राह्मण रूपी वृक्ष की जड सन्ध्या है, वेद उसकी शाखाएँ हैं, धर्मकर्म उसके पत्ते हैं, अतः प्रयत्नपूर्वक जड की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि जड के कट जाने , नष्ट हो जाने पर शाखा और पत्ते भी नहीं रहते ।

विर्मशः---

इस श्लोक में सन्ध्या के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है । प्रत्येक द्विज को प्रतिदिन दोनों समय सन्ध्या अवश्य करनी चाहिएःः---

"सन्ध्या येन न विज्ञाता सन्ध्या येनानुपासिता ।
जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चैव जायते ।।"
(देवीभागवत--11.16.7)

अर्थः---जिसने सन्ध्या के रहस्य को नहीं जाना और जिसने जीवन में सन्ध्या-उपासना नहीं की, वह जीते-जी शूद्र हो जाता है और मरने के पश्चात् भी कुत्ता बनता है ।

"ये न पूर्वामुपासन्ते द्विजाः सन्ध्यां न पश्चिमाम् ।
सर्वांस्तान्धार्मिको राजा शूद्रकर्माणि कारयेत् ।।"
(महा.अनु. 104.19)



अर्थः---जो द्विज प्रातः और सायं सन्ध्या नहीं करते, धार्मिक राजा उन सबसे शूद्रकर्म (सेवाकार्य) कराएँ ।

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